
खेतों में मनरेगा काम करती महिलाएँ
यूपी में मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी: 42% तक पहुँची, नई ऊँचाई को छुआ
जब हम ग्रामीण भारत की तस्वीर देखते हैं तो सबसे बड़ी समस्या रोजगार और आर्थिक सुरक्षा की होती है। ऐसे में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना) ग्रामीण परिवारों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं। यह योजना सिर्फ मज़दूरी का काम नहीं देती बल्कि आत्मनिर्भरता और सम्मान की राह भी खोलती है।
इसका मुख्य उद्देश्य है ग्रामीण इलाकों के लोगों को 100 दिन का गारंटीड रोजगार देना।
महिलाओं की बढ़ती भूमिका
हाल ही में आई रिपोर्ट्स के अनुसार, उत्तर प्रदेश में मनरेगा में महिलाओं की भागीदारी 42% तक पहुँच गई है। यह आंकड़ा न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का संकेत है बल्कि समाज में महिलाओं की बढ़ती जागरूकता और आत्मनिर्भरता को भी दर्शाता है। पहले जहाँ महिलाएँ घर की चारदीवारी में सिमटी रहती थीं, अब वही महिलाएँ गाँव के विकास कार्यों में बराबर की हिस्सेदार बन रही हैं।
क्यों है यह बदलाव महत्वपूर्ण?
* आर्थिक स्वतंत्रता: महिलाएँ अब सिर्फ घर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि रोजगार के माध्यम से अपने परिवार की आर्थिक ज़रूरतों में योगदान कर रही हैं।
* सामाजिक सशक्तिकरण: गाँव की महिलाएँ अब आत्मनिर्भर बन रही हैं, जिससे समाज में उनकी स्थिति मज़बूत हो रही है।
* शिक्षा व स्वास्थ्य पर असर: महिलाओं के पास आय आने से बच्चों की पढ़ाई और परिवार के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ रहा है।
* आत्मनिर्भरता की ओर कदम: मज़दूरी से मिली कमाई ने महिलाओं को आत्मविश्वास दिया है कि वे भी परिवार और समाज में बराबरी का दर्जा पा सकती हैं।
* गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूती: महिलाएँ अपनी कमाई से छोटे-छोटे व्यवसाय या ज़रूरी सामान खरीदकर गाँव की अर्थव्यवस्था को जीवंत बना रही हैं।
सरकार की पहल और बदलाव
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| समूह में हँसते हुए मनरेगा मजदूर |
सरकार ने भी महिलाओं को मनरेगा से जोड़ने के लिए कई काम किए हैं –
* क्रेच सुविधा: काम करने वाली माताओं के बच्चों के लिए देखभाल की व्यवस्था।
* बराबरी की मज़दूरी: पुरुष और महिला दोनों को समान भुगतान।
* महिला समूहों की भागीदारी: गाँव स्तर पर महिला समूहों को मनरेगा कार्यों से जोड़ा गया है।
लेकिन चुनौतियाँ भी मौजूद
हालांकि, अभी भी कई चुनौतियाँ सामने हैं —
* भुगतान में देरी: कई बार मज़दूरी समय पर नहीं मिलती।
* प्रशिक्षण की कमी: महिलाओं को तकनीकी और नई तरह के कामों में ट्रेनिंग की ज़रूरत है।
* सामाजिक संकोच: गाँवों के कुछ हिस्सों में अभी भी महिलाओं का बाहर जाकर काम करना लोगों को स्वीकार्य नहीं है।
निष्कर्ष
आज यूपी की महिलाएँ मनरेगा के ज़रिए सिर्फ परिवार का सहारा नहीं बनी हैं, बल्कि समाज में बदलाव की मिसाल भी पेश कर रही हैं। 42% की भागीदारी ये दिखाती है कि महिलाएँ अगर अवसर पाती हैं, तो वे न केवल खुद का भविष्य बदल सकती हैं बल्कि पूरे गाँव और राज्य की तस्वीर भी बदल देती हैं।


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