Delhi Cloud Seeding Experiment 2025 – दिल्ली में प्रदूषण कम करने की नई पहल

“Delhi Cloud Seeding experiment to reduce pollution by artificial rain in October 2025”

 “Cloud Seeding Experiment 2025”



 दिल्ली में प्रदूषण से राहत के लिए कृत्रिम वर्षा की तैयारी | 29 अक्टूबर को हो सकता है पहला Cloud Seeding ट्रायल


दिवाली के बाद दिल्ली एक बार फिर ज़हरीली हवा में घिरी नज़र आ रही है। सरकार अब इस संकट से निपटने के लिए एक अनोखा कदम उठाने जा रही है — कृत्रिम वर्षा (Artificial Rain), जिसे वैज्ञानिक भाषा में Cloud Seeding कहा जाता है।

दिल्ली में 29 अक्टूबर 2025 को इसका पहला ट्रायल रन किया जाएगा, और अगर सब कुछ सही रहा, तो नवंबर की शुरुआत में इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाएगा।

इस प्रयोग का मुख्य उद्देश्य हवा में मौजूद प्रदूषक कणों को बारिश के ज़रिए नीचे गिराकर वायु गुणवत्ता में सुधार लाना है।



दिल्ली की हवा बनी ‘खतरनाक’



सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, दिल्ली का AQI 475 तक पहुंच गया है — जो ‘Severe’ श्रेणी में आता है। वायु में PM2.5 और PM10 कणों की मात्रा सामान्य सीमा से 8 गुना अधिक दर्ज की गई है। ऐसे में, कृत्रिम वर्षा ही एकमात्र अस्थायी उपाय माना जा रहा है जो धूल और धुएं को नीचे बैठाने में मदद कर सकता है।



क्या होता है Cloud Seeding?


Cloud Seeding एक तकनीक है जिसमें वैज्ञानिक बादलों में सिल्वर आयोडाइड (Silver Iodide), सोडियम क्लोराइड (NaCl) या पोटैशियम आयोडाइड (KI) जैसे रसायन डालते हैं। ये कण बादलों के अंदर जाकर जलवाष्प को संघनित (condense) कर देते हैं, जिससे बारिश होती है।

संक्षेप में —
“Cloud Seeding का मतलब है बादलों को कृत्रिम रूप से बारिश करने के लिए प्रेरित करना।”




दिल्ली में क्यों ज़रूरी है यह प्रयोग



हर साल अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली की हवा में प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुँच जाता है। पराली जलाने, वाहन धुआं और औद्योगिक गतिविधियों से वायु गुणवत्ता बिगड़ती है। इस साल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने रिपोर्ट दी है कि AQI लगातार “Very Poor” श्रेणी में बना हुआ है। ऐसे में Cloud Seeding से अस्थायी राहत मिल सकती है।




कहां और कैसे किया जाएगा ट्रायल


“दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बादलों में रसायन छोड़ते एयरक्राफ्ट का दृश्य, आसमान में घना धुंध और नीचे दिल्ली शहर का व्यू।”
दिल्ली में प्रदूषण नियंत्रण के लिए बादलों में रसायन छोड़ते एयरक्राफ्ट का दृश्य



ट्रायल दिल्ली-एनसीआर के आसपास किया जाएगा, खासकर उन इलाकों में जहां हवा का घनत्व (air stagnation) ज़्यादा है। इसमें IIT कानपुर की टीम, दिल्ली सरकार और IMD (Indian Meteorological Department) मिलकर काम करेंगे।
टेक्नोलॉजी के लिए IIT Kanpur के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग ने दो छोटे एयरक्राफ्ट तैयार किए हैं जो बादलों में रसायन छोड़ेगे।




क्या यह तकनीक सफल होगी?



IIT कानपुर के प्रोफेसर मनीष शर्मा के अनुसार —

“अगर मौसम अनुकूल रहा और पर्याप्त नमी (humidity) मौजूद रही, तो कृत्रिम वर्षा दिल्ली के प्रदूषण स्तर को 30% तक घटा सकती है।”

हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यह सिर्फ अस्थायी उपाय है — लंबे समय के लिए वाहनों, उद्योगों और पराली जलाने पर नियंत्रण जरूरी है।




कृत्रिम वर्षा की सीमाएं




* बादल मौजूद न हों तो Cloud Seeding बेकार है।

* लागत बहुत अधिक होती है — एक ट्रायल में 30–40 लाख रुपये तक का खर्च।

* इसके परिणाम मौसम और हवा की दिशा पर निर्भर करते हैं।




पहले कहां हुआ था प्रयोग




भारत में Cloud Seeding के सफल प्रयोग पहले भी किए जा चुके हैं —

*  कर्नाटक (2017) – मानसून की कमी पूरी करने के लिए।

*  महाराष्ट्र (2019) – सूखे से राहत दिलाने के लिए।

*  बीजिंग (2008 ओलंपिक) – बारिश को नियंत्रित करने के लिए।

अब दिल्ली इस तकनीक को प्रदूषण नियंत्रण के लिए आजमाने जा रही है — जो अपने आप में एक ऐतिहासिक प्रयोग है।




 निष्कर्ष



दिल्ली में कृत्रिम वर्षा की यह पहल न केवल एक वैज्ञानिक कदम है, बल्कि जनता की सांसों के लिए उम्मीद की किरण भी है।
अगर यह ट्रायल सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में बड़े पैमाने पर इसका उपयोग पूरे देश में किया जा सकता है।




FAQs



Q1. Cloud Seeding क्या है?
Cloud Seeding एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें बादलों में रसायन डालकर कृत्रिम रूप से बारिश कराई जाती है।

Q2. दिल्ली में Cloud Seeding कब होगी?
इसका पहला ट्रायल 29 अक्टूबर 2025 को दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में होगा।

Q3. क्या यह प्रदूषण कम करेगा?
हाँ, इससे हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक तत्व नीचे बैठ जाते हैं जिससे AQI सुधर सकता है।

Q4. क्या Cloud Seeding से कोई नुकसान है?
अभी तक कोई बड़ा नुकसान नहीं देखा गया है, लेकिन यह तकनीक केवल अस्थायी समाधान है।

Q5. Cloud Seeding का खर्च कितना होता है?
एक ट्रायल की औसत लागत ₹30 से ₹40 लाख तक होती है।

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