![]() |
| “IIT कानपुर के वैज्ञानिक क्लाउड सीडिंग विमान की तैयारी करते हुए, बैकग्राउंड में दिल्ली का स्काईलाइन।” |
दिल्ली में पहली बार कृत्रिम बारिश की तैयारी — IIT कानपुर और दिल्ली सरकार की ऐतिहासिक पहल
दिल्ली की हवा हर साल जहरीली होती जा रही है। नवंबर-दिसंबर के महीनों में हालात इतने खराब हो जाते हैं कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है। इसी को देखते हुए दिल्ली सरकार ने IIT कानपुर के साथ मिलकर एक बड़ा कदम उठाया है — “क्लाउड सीडिंग (Cloud Seeding)” का प्रयोग।
यह पहला मौका होगा जब राजधानी में कृत्रिम बारिश कर प्रदूषण कम करने की कोशिश की जाएगी। अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो यह न सिर्फ दिल्ली बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए गेम चेंजर साबित हो सकता है।
क्लाउड सीडिंग आखिर है क्या?
![]() |
| “दिल्ली के ऊपर उड़ता विमान जो बादलों में रासायनिक स्प्रे कर रहा है।” |
क्लाउड सीडिंग एक ऐसी वैज्ञानिक तकनीक है जिसमें बादलों के अंदर रासायनिक तत्व (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या पोटेशियम क्लोराइड) छोड़े जाते हैं।ये रसायन नमी को आकर्षित करते हैं, जिससे बादल भारी होते हैं और फिर बारिश शुरू हो जाती है।
यह प्रक्रिया प्राकृतिक बारिश जैसी ही होती है, फर्क सिर्फ इतना है कि इसमें मौसम को थोड़ा “ट्रिगर” किया जाता है ताकि बारिश जल्द हो सके।
दिल्ली को इस तकनीक की जरूरत क्यों पड़ी?
![]() |
| “बारिश के बाद साफ आसमान और इंडिया गेट के पास दिखती नीली हवा।” |
दिल्ली में हर साल अक्टूबर से जनवरी तक प्रदूषण चरम पर पहुंच जाता है।
* पंजाब और हरियाणा में पराली जलाना,
* सड़कों पर बढ़ती गाड़ियों की संख्या,
* और ठंड में हवा का कम बहना —
इन सब कारणों से दिल्ली की हवा जहरीली हो जाती है।
क्लाउड सीडिंग से उम्मीद है कि बारिश के जरिये स्मॉग (Smog) और धूल के कण (PM2.5 और PM10) जमीन पर बैठ जाएंगे, जिससे हवा की क्वालिटी सुधरेगी।
IIT कानपुर की रिसर्च और प्लानिंग
IIT कानपुर की टीम ने पहले भी 2018 और 2023 में उत्तर प्रदेश में सफल क्लाउड सीडिंग प्रयोग किए हैं।
अब वही टीम दिल्ली में इस तकनीक को लागू करने जा रही है।
उनकी रिपोर्ट के अनुसार:
“अगर दिल्ली में हवा में पर्याप्त नमी और बादल मौजूद होंगे, तो हम अक्टूबर के तीसरे या चौथे सप्ताह में क्लाउड सीडिंग शुरू कर सकते हैं।”
इसके लिए दिल्ली सरकार ने पर्यावरण मंत्रालय से भी अनुमति मांगी है।
ऑपरेशन कैसे होगा?
![]() |
| “पराली और स्मॉग से ढकी दिल्ली, और दूसरी तरफ कृत्रिम बारिश के बाद का साफ शहर।” |
1- दो विशेष विमानों में स्प्रे मशीनें लगाई जाएंगी।
2- जब मौसम विभाग यह सुनिश्चित करेगा कि बादल बरसने योग्य हैं, तब वैज्ञानिक विमान से बादलों में सिल्वर आयोडाइड छोड़ेंगे।
3- लगभग 30 से 45 मिनट में कृत्रिम बारिश शुरू हो सकती है।
4- इसके बाद प्रदूषण स्तर की तुलना पहले और बाद के डेटा से की जाएगी।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि क्लाउड सीडिंग “जादू की छड़ी” नहीं है, लेकिन यह एक आपातकालीन राहत देने वाला तरीका जरूर है।
अगर इसे सही मौसम में किया जाए, तो यह PM स्तर को 25-30% तक घटा सकता है।
आम जनता की उम्मीदें
दिल्लीवासियों में इस खबर को लेकर उत्साह है।
कई लोगों का कहना है कि अगर कृत्रिम बारिश सफल रही, तो बच्चों और बुजुर्गों को प्रदूषण से राहत मिलेगी।
लोगों का मानना है कि यह पहल “दिल्ली की हवा में फिर से जान डाल सकती है।”
भविष्य की योजना
अगर यह प्रयोग सफल रहता है, तो दिल्ली सरकार इसे हर साल अक्टूबर-नवंबर के दौरान लागू करने की योजना बना सकती है।
साथ ही NCR, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद में भी इसे विस्तार देने की तैयारी है।
FAQs
प्र.1: क्या क्लाउड सीडिंग से पर्यावरण को नुकसान होता है?
उत्तर: नहीं, यह बिल्कुल सुरक्षित प्रक्रिया है क्योंकि इसमें इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बहुत कम मात्रा में होते हैं।
प्र.2: क्या यह तकनीक हर समय काम करती है?
उत्तर: नहीं, यह तभी काम करती है जब बादलों में पर्याप्त नमी और घनत्व मौजूद हो।
प्र.3: क्या इससे लंबी अवधि में प्रदूषण कम होगा?
उत्तर: नहीं, यह सिर्फ अस्थायी समाधान है। स्थायी सुधार के लिए प्रदूषण के स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी है।
प्र.4: क्या भारत में पहले भी ऐसा प्रयोग हुआ है?
उत्तर: हां, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश में पहले कई बार कृत्रिम बारिश के सफल प्रयोग हुए हैं।




0 Comments